नवीन शोध एवं प्रौद्योगिकी
परमाणु ऊर्जा सेक्टर में निजी भागीदारी और नया 'शांति अधिनियम'
'शांति अधिनियम 2025' और निजी क्षेत्र (Private Sector) की भागीदारी
- भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार करते हुए संसद द्वारा पारित 'शांति विधेयक' को भारत की राष्ट्रपति ने 21 दिसंबर 2025 को अपनी मंजूरी दे दी है।
- इस नए अधिनियम के तहत पहली बार निजी क्षेत्र (Private Entities) को केंद्र सरकार और नियामक बोर्ड की कड़ी सुरक्षा अनुमति के अंतर्गत परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने, ऊर्जा उत्पादन और उसके उपयोग की अनुमति दी गई है।
- इसका मुख्य उद्देश्य विकिरण प्रौद्योगिकी का सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करते हुए देश में ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाना और गैर-ऊर्जा अनुप्रयोगों (जैसे चिकित्सा व कृषि) का विकास करना है।
परमाणु क्षति और नागरिक दायित्व (Nuclear Liability)
- किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण परमाणु दुर्घटना की स्थिति में नागरिकों को मुआवजा देने के लिए इस अधिनियम में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप 'नागरिक दायित्व' (Civil Liability) का स्पष्ट व सख्त प्रावधान किया गया है।
- परमाणु संयंत्र के प्रकार के आधार पर संचालक (Operator) का दायित्व 100 करोड़ रुपये से लेकर 3,000 करोड़ रुपये तक तय किया गया है।
- संचालक की देयता की अधिकतम सीमा 300 मिलियन एसडीआर (SDR - Special Drawing Rights) निर्धारित की गई है। इस सीमा से अधिक की क्षति होने पर भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय 'पूरक मुआवजे पर कन्वेंशन' का सहारा ले सकती है।
- नए नियमों के अनुसार, किसी भी परमाणु दुर्घटना के घटित होने की स्थिति में 15 दिनों के भीतर केंद्र सरकार को इसकी औपचारिक अधिसूचना देना अनिवार्य कर दिया गया है।
परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की शक्तियां
- भारत में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा, डिजाइन, निर्माण और संचालन की उच्चतम स्तर की निगरानी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) द्वारा की जाती है।
- AERB को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 की धारा 16, 17 और 23 के तहत व्यापक वैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।
- अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि AERB का सुरक्षा और नियामक ढांचा सार्वजनिक और निजी, दोनों संस्थाओं के लिए समान रूप से तटस्थ और अत्यंत सख्त रहेगा।
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DEOrbit Exam Note:
परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy - DAE): भारत में यह विभाग किसी मंत्री के अधीन न होकर सीधे प्रधानमंत्री (Prime Minister) के प्रभार में कार्य करता है। भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा थे। वर्तमान में भारत के कुछ प्रमुख परमाणु संयंत्र हैं: तारापुर (महाराष्ट्र - सबसे पुराना), रावतभाटा (राजस्थान), कुडनकुलम व कलपक्कम (तमिलनाडु), काकरापार (गुजरात), कैगा (कर्नाटक) और नरोरा (उत्तर प्रदेश)। (SDR: 'Special Drawing Rights' अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा सृजित एक अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति है)।
IIT जोधपुर का नवाचार, कचरे से बनाईं 'बायो-ब्रिक्स' और 'एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स'
'कार्बन-नेगेटिव' पेटेंट बायो-ब्रिक्स (Bio-bricks) का निर्माण
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर के 'स्कूल ऑफ डिजाइन' (प्रो. प्रियव्रत राजत्व के नेतृत्व में) ने कृषि अवशेषों और प्लास्टिक कचरे का उपयोग करके टिकाऊ निर्माण सामग्री विकसित की है।
- पेटेंट बायो-ब्रिक्स: इन्हें धान की पराली, गेहूं के भूसे और गन्ने की खोई (Bagasse) जैसे कृषि अवशेषों से एक कम ऊर्जा वाली, शून्य-अपशिष्ट (Zero-waste) प्रक्रिया द्वारा बनाया गया है।
- कार्बन-नेगेटिव (Carbon-Negative): पारंपरिक पकी हुई लाल ईंटों (जिन्हें भट्ठे में पकाया जाता है) के विपरीत, इन ईंटों को पकाने की आवश्यकता नहीं होती। ये ईंटें अपने पूरे जीवनचक्र में उत्सर्जित होने वाले कार्बन की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को अपने अंदर सोखती (Sequestration) हैं, जिससे ये 'कार्बन-नेगेटिव' बन जाती हैं।
- यह तकनीक प्राकृतिक कच्चे माल पर निर्भरता कम करती है और भवनों को बेहतरीन 'थर्मल इंसुलेशन' (Thermal Insulation) प्रदान करती है।
'एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स' (APBs) और विकेंद्रीकृत व्यावसायिक मॉडल
- एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स (APBs): इस तकनीक में 'मिश्रित प्लास्टिक कचरे' और 'कृषि अवशेषों' को मिलाकर एक कम-ऊर्जा वाली 'थर्मल फ्यूजन और कम्प्रेशन' प्रक्रिया के जरिए टिकाऊ ब्लॉक तैयार किए जाते हैं।
- ये ब्लॉक्स प्लास्टिक की जटिल रीसाइक्लिंग प्रक्रियाओं की आवश्यकता को खत्म करते हैं और भवनों में बेहतर 'थर्मल' के साथ-साथ 'ध्वनिक (Acoustic) इंसुलेशन' भी प्रदान करते हैं।
- व्यावसायिक उपयोग: इस तकनीक का पहला 'बायो-ब्रिक संरचना मॉडल' (Demonstration model) भारत में तैयार किया जा चुका है और IIT जोधपुर में एक ईंट-आधारित इकाई का निर्माण कार्य भी जारी है।
- यह 'विकेंद्रीकृत' (Decentralized) उत्पादन मॉडल देश के विभिन्न हिस्सों (विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों) के लिए अत्यधिक लाभदायक है, जहाँ कचरे को सीधे निर्माण में उपयोग कर एक 'क्लोज्ड-लूप' प्रणाली बनाई जा सकती है।
राष्ट्रीय पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान
- भारत वर्तमान में दोहरी पर्यावरणीय चुनौती का सामना कर रहा है— पराली जलाने (Stubble Burning) से होने वाला भीषण वायु प्रदूषण और तेजी से बढ़ता हुआ प्लास्टिक कचरा।
- IIT जोधपुर का यह नवाचार इन दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान करता है। पराली का उपयोग ईंटें बनाने में होने से किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी मिलेगा।
- यह पहल 'हरित अवसंरचना' (Green Infrastructure), 'वेस्ट-टू-वेल्थ' (कचरे से कंचन) और 'सर्कुलर इकोनॉमी' (Circular Economy) के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित होगी।
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DEOrbit Exam Note:
पराली दहन (Stubble Burning) और वायु प्रदूषण: उत्तर भारत (विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में सर्दियों के दौरान धान की कटाई के बाद खेत साफ करने के लिए 'पराली' (Stubble) जलाई जाती है। इसके दहन से भारी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), मीथेन (CH4), नाइट्रोजन ऑक्साइड (N2O) और हानिकारक PM2.5 व PM10 सूक्ष्म कण उत्सर्जित होते हैं, जो दिल्ली-NCR में जानलेवा 'स्मॉग' (Smog) का मुख्य कारण बनते हैं। 'बायो-ब्रिक्स' जैसी तकनीकें इस पराली को जलाए जाने से रोककर इसे एक मूल्यवान संसाधन में बदल सकती हैं।
भारत-ब्रिटेन साझेदारी के तहत 'एडवांस्ड ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर' का विकास
TDB-DST का सहयोग और 'इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग नवोन्मेषण सशक्तिकरण' परियोजना
- भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत कार्यरत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) ने "इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग नवोन्मेषण सशक्तिकरण" नामक एक महत्वाकांक्षी परियोजना को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया है।
- यह परियोजना औद्योगिक स्थिरता के लिए 'भारत-ब्रिटेन सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम' के तहत संचालित की जा रही है।
- इस पहल के अंतर्गत, TDB ने भारतीय स्टार्टअप 'मेसर्स एसचार्ज प्राइवेट लिमिटेड' (S-Charge Pvt Ltd) के साथ एक महत्वपूर्ण तकनीकी और वित्तीय समझौता किया है।
- परियोजना का मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन स्थित भागीदार 'अलब्राइट प्रोडक्ट डिजाइन लिमिटेड' (Albright Product Design Ltd) के साथ मिलकर उन्नत और कुशल इलेक्ट्रिक वाहन (EV) चार्जिंग समाधान विकसित करना है।
- इस पूरी परियोजना का प्राथमिक लक्ष्य वाणिज्यिक बेड़े (Commercial Fleets) और डिपो संचालन के लिए अगली पीढ़ी (Next-Gen) के हाई-टेक EV चार्जिंग समाधान तैयार करना है, ताकि बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाया जा सके।
स्वदेशी चार्ज कंट्रोलर और पेटेंटेड 'केबल प्रबंधन प्रणाली' का एकीकरण
- यह तकनीकी समाधान एसचार्ज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित स्वदेशी 'नवोन्मेषी इलेक्ट्रिक वाहन चार्जर चार्ज कंट्रोलर' को ब्रिटेन की कंपनी के पेटेंट-प्राप्त 'स्वचालित केबल प्रबंधन प्रणाली' के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत करेगा।
- इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'मोटरयुक्त ओवरहेड केबल प्रबंधन' (Motorised overhead cable management) है, जो फ्लीट-आधारित (Commercial Fleet) अनुप्रयोगों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है।
- यह ओवरहेड प्रणाली मैन्युअल हैंडलिंग को काफी कम कर देती है, जिससे केबलों को होने वाली क्षति न्यूनतम हो जाती है और उच्च मांग वाले वातावरण में उपयोगकर्ता की सुरक्षा एवं सुविधा बढ़ती है।
- यह नई विकसित प्रणाली वर्तमान में मौजूद 'एसी टाइप-2 ईवी चार्जर' (AC Type-2 EV Charger) के पूरी तरह से अनुकूल है और डिपो में सुरक्षित तथा व्यवस्थित अवसंरचना सुनिश्चित करती है।
- TDB के सचिव श्री राजेश कुमार पाठक के अनुसार, यह उन्नत और उद्योग-अनुकूल नवाचार भारत में एक मजबूत, कुशल और भविष्य के लिए तैयार इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (e-Mobility) इकोसिस्टम के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
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DEOrbit Exam Note:
प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) और भारत-यूके विज्ञान सहयोग: TDB भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना वर्ष 1996 में 'प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड अधिनियम, 1995' के तहत की गई थी। इसका मुख्य कार्य स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास और व्यावसायीकरण (Commercialization) को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इसके अलावा, भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच विज्ञान एवं नवाचार में साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए ऐतिहासिक 'भारत-यूके नेट ज़ीरो इनोवेशन वर्चुअल सेंटर' की स्थापना की गई है, जो विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान को गति प्रदान कर रहा है।
कलपक्कम में 500 MW के स्वदेशी 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (PFBR) ने पहली बार प्राप्त की क्रिटिकेलिटी
ऐतिहासिक उपलब्धि: पहली क्रिटिकेलिटी और विनियामक मंजूरी
- भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट (MW) के 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (PFBR) में 6 अप्रैल 2026 को सफलतापूर्वक प्रथम क्रिटिकेलिटी (First Criticality) प्राप्त कर ली है।
- क्रिटिकेलिटी का अर्थ रिएक्टर के कोर में 'नियंत्रित विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया' (Controlled Fission Chain Reaction) की सुरक्षित और सफल शुरुआत होना है।
- यह महत्वपूर्ण उपलब्धि 'परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड' (AERB - Atomic Energy Regulatory Board) द्वारा संयंत्र प्रणालियों की अत्यंत सख्त और गहन सुरक्षा समीक्षा के बाद दी गई मंजूरी के पश्चात हासिल की गई है।
- इस ऐतिहासिक अवसर पर परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) के अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार मोहंती सहित कई शीर्ष वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित रहे।
स्वदेशी डिज़ाइन, निर्माण और संचालन (IGCAR एवं BHAVINI)
- इस उन्नत PFBR की प्रौद्योगिकी का पूर्ण विकास और डिज़ाइन स्वदेशी रूप से 'इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र' (IGCAR) द्वारा किया गया है, जो परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का एक प्रमुख अनुसंधान एवं विकास केंद्र है।
- इस विशाल रिएक्टर का निर्माण और वर्तमान में इसका संचालन 'भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड' (BHAVINI - भाविनी) द्वारा किया जा रहा है, जो DAE के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU) है।
- इस स्वदेशी डिज़ाइन और विनिर्माण तंत्र की मजबूती भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' दृष्टिकोण और 'बंद ईंधन चक्र' (Closed Fuel Cycle) तकनीक में उत्कृष्टता को दर्शाती है।
तकनीकी विशेषताएँ: MOX ईंधन, लिक्विड सोडियम और 'ब्रीडिंग'
- पारंपरिक थर्मल रिएक्टरों के विपरीत, PFBR का कोर 'यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड' (MOX - Mixed Oxide) ईंधन का उपयोग करता है।
- इस कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 (U-238) की एक परत (ब्लैंकेट) होती है; तीव्र न्यूट्रॉन (Fast Neutrons) इस U-238 को विखंडनीय प्लूटोनियम-239 (Pu-239) में परिवर्तित कर देते हैं।
- इस प्रक्रिया (Breeding) के कारण ही इस रिएक्टर को 'ब्रीडर' कहा जाता है, क्योंकि यह जितना ईंधन खपत करता है, उससे अधिक ईंधन का उत्पादन कर पाता है।
- रिएक्टर को ठंडा रखने और ऊष्मा स्थानांतरण के लिए इसमें उच्च तापमान वाले 'तरल सोडियम शीतलक' (Liquid Sodium Coolant) तकनीक का उपयोग किया गया है।
भारत के 'त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम' का दूसरा और तीसरा चरण
- PFBR का चालू होना भारत के त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम (Three-Stage Nuclear Power Programme) के 'दूसरे चरण' की पूर्ण क्षमता को साकार करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
- यह फास्ट ब्रीडर तकनीक वर्तमान 'भारी जल रिएक्टरों' (प्रथम चरण) और भविष्य में स्थापित होने वाले 'थोरियम-आधारित रिएक्टरों' (तीसरे चरण) के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी (Crucial Link) का काम करती है।
- इस रिएक्टर में भविष्य में थोरियम-232 (Th-232) का उपयोग किया जा सकेगा, जो रूपांतरण के माध्यम से यूरेनियम-233 (U-233) में परिवर्तित हो जाएगा।
- यह तकनीक भारत को अपने विशाल थोरियम (Thorium) भंडारों का उपयोग करके तीसरे चरण के लिए ईंधन तैयार करने और दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाएगी।
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DEOrbit Exam Note:
भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम (Three-Stage Nuclear Programme): इसकी परिकल्पना डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने की थी।
• चरण-1: दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) - इसमें प्राकृतिक यूरेनियम (ईंधन) और भारी जल (D2O - शीतलक व मंदक) का उपयोग होता है।
• चरण-2: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) - इसमें प्लूटोनियम (Pu-239) आधारित MOX ईंधन का उपयोग होता है और यह बिना मॉडरेटर (मंदक) के कार्य करता है। शीतलक के रूप में 'तरल सोडियम' का प्रयोग होता है।
• चरण-3: एडवांस हेवी वाटर रिएक्टर (AHWR) - यह थोरियम-232 (U-233 में परिवर्तित) पर आधारित होगा। भारत में थोरियम मुख्य रूप से केरल तट की मोनाजाइट रेत में पाया जाता है। कलपक्कम (चेन्नई, तमिलनाडु) भारत का वह स्थान है जहाँ IGCAR और BHAVINI दोनों स्थित हैं, जो FBR तकनीक का केंद्र है।
वैज्ञानिकों ने विकसित किया 'मेंढक' से प्रेरित न्यूरोमॉर्फिक सेंसर
मस्तिष्क की तरह काम करने वाला नमी-संवेदनशील उपकरण, बचाएगा ऊर्जा
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (JNCASR) के शोधकर्ताओं ने एक 'आर्द्रता-संवेदनशील न्यूरोमॉर्फिक सेंसर' विकसित किया है।
- इस सेंसर के विकास की प्रेरणा मुख्य रूप से 'क्रिकेट मेंढकों' (Cricket Frogs) से मिली है, जिनका सिम्पैटिक व्यवहार अत्यधिक नमी (Humidity) और दिन के प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है।
- यह एक उन्नत 'सुपरमॉलिक्यूलर नैनोफाइबर' आधारित सेंसर है जो पर्यावरण में होने वाले बदलावों को महसूस कर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया की नकल करता है।
- पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स के विपरीत, यह एक ही उपकरण प्लेटफॉर्म में जानकारी को महसूस करने (Sensing), संसाधित (Processing) और संग्रहीत (Memory) करने में सक्षम है, जिससे अतिरिक्त ऊर्जा खपत की भारी बचत होती है।
- इस महत्वपूर्ण शोध को 'जर्नल ऑफ मटेरियल्स केमिस्ट्री सी' में प्रकाशित किया गया है।
- भविष्य में इस तकनीक का उपयोग स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, उन्नत स्वास्थ्य देखभाल उपकरणों, AI और 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स' (IoT) में किया जा सकता है।
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DEOrbit Exam Note:
न्यूरोमॉर्फिक इलेक्ट्रॉनिक्स (Neuromorphic Electronics): यह उपकरण डिजाइन करने का एक तरीका है जो जैविक तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क) की कार्यप्रणाली की नकल करने का लक्ष्य रखता है। इसमें जैविक संवेदी तंत्र संवेदन और सिग्नल प्रोसेसिंग एक साथ करते हैं, जो इसे पारंपरिक कंप्यूटिंग सिस्टम (जहां सेंसर, स्मृति और प्रोसेसिंग अलग-अलग होते हैं) की तुलना में अत्यधिक ऊर्जा-कुशल (Energy efficient) और प्रभावी बनाता है।
भविष्य के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए तापमान-नियंत्रित 'नैनो-सामग्री'
CeNS और JNCASR के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण सफलता
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन बेंगलुरु स्थित 'सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज' (CeNS) और JNCASR के वैज्ञानिकों ने छोटे कार्बनिक अणुओं को उन्नत कार्यात्मक सामग्री बनाने के लिए निर्देशित करने में सफलता हासिल की है।
- शोधकर्ताओं ने नेफ़थलीन डाइमाइड (NDI) नामक एक उभयपरक (Amphiphilic) अणु का अध्ययन किया, जिसमें पानी में खुद को व्यवस्थित करने (Self-assembly) की अनूठी क्षमता होती है।
- कमरे के तापमान पर, ये अणु स्वतः 'नैनोडिस्क' (Nanodisks) में बदल जाते हैं, जिनकी विद्युत चालकता काफी अधिक होती है और ये ध्रुवीकृत प्रकाश के साथ परस्पर क्रिया (Chiroptical activity) करते हैं।
- गर्म करने पर, ये नैनोडिस्क दो-आयामी 'नैनोशीट' (Nanosheets) में बदल जाते हैं, जिससे इनकी विद्युत चालकता लगभग 100 गुना कम हो जाती है और चिरोप्टिकल सक्रियता समाप्त हो जाती है।
- यह अध्ययन 'अमेरिकन केमिकल सोसाइटी' द्वारा 'एसीएस एप्लाइड नैनो मैटेरियल्स' में प्रकाशित किया गया है।
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DEOrbit Exam Note:
नैनो-सामग्री का महत्व: केवल 'तापमान' का उपयोग करके पदार्थ के संरचनात्मक, प्रकाशीय और विद्युत गुणों को गतिशील रूप से समायोजित (Tune) करने की यह क्षमता छोटे कार्बनिक अणुओं में अत्यंत दुर्लभ है। यह शोध भविष्य के अनुकूलनीय ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, स्मार्ट सेंसर और अगली पीढ़ी के स्मार्ट सामग्रियों (Smart Materials) के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त करता है।
अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर
नीति आयोग ने R&D प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए रिपोर्ट जारी की
- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के नवाचार इको-सिस्टम को मजबूत करने के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) गतिविधियों में निजी क्षेत्र से अपनी भागीदारी बढ़ाने का आग्रह किया है।
- इस अवसर पर नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा अनुसंधान प्रक्रियाओं को सुगम बनाने ('अनुसंधान में सुगमता' / Ease of Doing Research) से संबंधित दो रिपोर्टों का विमोचन किया गया।
- सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए अंतरिक्ष (Space) और परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है।
- मंत्री ने R&D के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) फंड के पूरी तरह से उपयोग न होने पर चिंता व्यक्त की और 'प्रक्रिया-उन्मुख' (Process-oriented) के बजाय 'परिणाम-उन्मुख' (Result-oriented) दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया।
- शोध पत्रिकाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने वाली "एक राष्ट्र, एक सदस्यता" (One Nation, One Subscription) जैसी सकारात्मक पहल का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया।
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DEOrbit Exam Note:
अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): यह R&D में निजी क्षेत्र के वित्तपोषण (Funding) को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू की गई एक प्रमुख पहल है। इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सीईओ बी.वी.आर. सुब्रमण्यम, सदस्य डॉ. वी.के. सारस्वत और भारत के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) प्रो. ए.के. सूद ने भी भाग लिया और वैज्ञानिक तंत्र में प्रशासनिक बाधाओं को कम करने पर जोर दिया।
'विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन' सम्मेलन का उद्घाटन
उपराष्ट्रपति ने भारत मंडपम में किया शुभारंभ; "विकास भी, विरासत भी" पर जोर
- भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन - भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण' विषय पर आधारित सम्मेलन का उद्घाटन किया।
- इस सम्मेलन का आयोजन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), 'पूर्वोत्तर प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एवं प्रसार केंद्र' (NECTAR) और 'ITITI दून संस्कृति स्कूल', देहरादून के सहयोग से किया गया।
- उपराष्ट्रपति ने बताया कि भारत में लगभग 1.4 लाख जनजातीय गाँव हैं, जिनमें देश की लगभग 9 प्रतिशत आबादी रहती है, जो प्राचीन संस्कृति और जैव विविधता की असली रक्षक है।
- उन्होंने 'विकसित भारत @ 2047' के मार्गदर्शक सिद्धांत "विकास भी, विरासत भी" का उल्लेख करते हुए आधुनिक विकास और परंपराओं के संरक्षण को एक-दूसरे का पूरक बताया।
- उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देते हुए याद दिलाया कि उन्होंने ही अलग 'जनजातीय कार्य मंत्रालय' की स्थापना की थी।
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DEOrbit परीक्षा नोट्स:
प्रमुख जनजातीय योजनाएं: उपराष्ट्रपति ने सरकार की दो प्रमुख पहलों पर विशेष प्रकाश डाला। 1. PM-JANMAN (पीएम-जनमन): इसके तहत जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है (जैसे- 7,300 किमी सड़कें)। 2. धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान: यह एक विशाल पहल है, जिसके तहत 63,000 से अधिक जनजातीय गाँवों में स्वच्छ जल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और स्थायी आजीविका जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
स्वदेशी सिलिकॉन फोटोनिक्स टेक्नोलॉजी: आईआईटी मद्रास में नए सॉल्यूशंस लॉन्च
प्रमुख विकास और लॉन्च
- इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव श्री एस. कृष्णन ने 24 अप्रैल 2026 को स्वदेशी रूप से विकसित 'सिलिकॉन फोटोनिक्स प्रौद्योगिकी समाधान' लॉन्च किए।
- ये समाधान आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के 'सेंटर फॉर प्रोग्रामेबल फोटोनिक इंटीग्रेटेड सर्किट्स एंड सिस्टम्स' (CPPICS) में विकसित किए गए हैं।
- लॉन्च किए गए दो मुख्य घटक हैं: (क) सिलिकॉन फोटोनिक्स प्रोसेस डिज़ाइन किट (PDK) और (ख) यूनिवर्सल पैकेजेड पीपीआईसी (PPIC) टेस्ट इंजन।
- यह पहल भारत के लिए 'सिलिकॉन फोटोनिक्स टेक्नोलॉजी सॉवरेन्टी' (प्रौद्योगिकी संप्रभुता) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह भारतीय फोटोनिक्स अनुसंधान समुदाय के लिए एक साझा राष्ट्रीय सुविधा के रूप में कार्य करेगा।
तकनीकी क्षमताएं और अनुप्रयोग
- प्रोसेस डिज़ाइन किट (PDK): इसमें 50 से अधिक सत्यापित कंपोनेंट हैं, जो उद्योगों, स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थानों और रक्षा अनुसंधान संगठनों को उन्नत फोटोनिक आईसी (IC) विकसित करने में आवश्यक डिज़ाइन सहायता प्रदान करेंगे।
- टेस्ट इंजन: यह फोटोनिक और ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल के लिए एक अत्याधुनिक स्वचालित 'कैरेक्टराइजेशन प्लेटफॉर्म' है।
- इस तकनीक के अनुप्रयोग क्लासिकल और क्वांटम दोनों क्षेत्रों में हैं।
- इस परियोजना में उत्पाद अनुसंधान, विकास और विनिर्माण (PRDM) मॉडल का अनुसरण किया गया है, जिसमें 'सिल्टेरा मलेशिया' (SilTerra Malaysia) फाउंड्री पार्टनर के रूप में और बेंगलुरु स्थित 'इग्नी माइक्रोसिस्टम्स' (Ignis MicroSystems) पैकेजिंग पार्टनर के रूप में शामिल हैं।
DEOrbit परीक्षा नोट्स:
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत इस तकनीक को बढ़ावा देने से भविष्य में 'आईएसएम 2.0' (ISM 2.0) के अंतर्गत भारत में एकीकृत पैकेजिंग सुविधाओं से युक्त एक पूर्ण 'सिलिकॉन फोटोनिक्स फैब' (Silicon Photonics Fab) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यह नवाचार भारत को वैश्विक स्तर की अत्याधुनिक तकनीक के बराबर खड़ा कर रहा है।
तकनीकी संप्रभुता: उभरती प्रौद्योगिकियों में भारत का नेतृत्व
पैन-आईआईटी (Pan-IIT) पूर्व छात्र सम्मेलन और मुख्य विजन
- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लॉस एंजिल्स में वर्चुअल रूप से आयोजित 'अखिल-आईआईटी पूर्व छात्र सम्मेलन' को संबोधित किया।
- इस सम्मेलन में वैश्विक प्रौद्योगिकी नेताओं, उद्यमियों, निवेशकों और शोधकर्ताओं सहित आईआईटी के पूर्व छात्रों के नेटवर्क ने भाग लिया।
- मंत्री महोदय ने जोर देकर कहा कि आने वाले दशकों में तकनीकी क्षमता ही राष्ट्रीय शक्ति को परिभाषित करेगी और भारत को केवल प्रौद्योगिकी का 'उपभोक्ता' होने से आगे बढ़कर एक 'वैश्विक चालक' (Global Driver) और नवप्रवर्तक बनना होगा।
- उन्होंने 2047 तक 'विकसित भारत' के विजन का उल्लेख करते हुए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को भविष्य के विकास की नींव बताया।
तकनीकी संप्रभुता के लिए प्रमुख फोकस क्षेत्र और पहल
| फोकस क्षेत्र | महत्व और संबंधित विवरण |
|---|---|
| उभरती प्रौद्योगिकियां (Emerging Tech) | राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लचीलेपन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और क्वांटम प्रौद्योगिकियों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया। |
| नवाचार के उत्प्रेरक (Innovation Catalysts) | भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का विस्तार, जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) में प्रगति और डीप-टेक (Deep-tech) स्टार्टअप्स का उदय नवाचार को लगातार गति दे रहे हैं। |
| प्रवासी भागीदारी और शिक्षा मॉडल | दिल्ली-एनसीआर स्थित ऋषिहुड विश्वविद्यालय में 'सज्जन जिंदल स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी' का शुभारंभ प्रवासी भारतीयों द्वारा समर्थित ऐसी पहल का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो भारत के तकनीकी आधार को मजबूत करता है। |
DEOrbit परीक्षा नोट्स:
भारत की 'तकनीकी संप्रभुता' (Technological Sovereignty) का अर्थ है महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता हासिल करना, ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बाधित होने पर भी देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था अप्रभावित रहे। डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रवासी भारतीयों (विशेषकर आईआईटी के पूर्व छात्रों) से 'डीप-टेक' में निवेश करने का जो आह्वान किया है, वह भारत के प्रतिभा पलायन (Brain-Drain) को 'प्रतिभा लाभ' (Brain-Gain) में बदलने की एक अहम रणनीतिक पहल है।
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर: भारत की ऐतिहासिक परमाणु उपलब्धि
प्रथम क्रिटिकैलिटी और वैश्विक स्थिति
- केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने घोषणा की है कि रूस के बाद भारत व्यावसायिक स्तर पर 'फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (FBR) संचालित करने वाला विश्व का दूसरा देश बनने जा रहा है।
- भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) को सफलतापूर्वक विकसित किया है, जिसने 6 अप्रैल, 2026 को अपनी 'प्रथम क्रिटिकैलिटी' (First Criticality) हासिल कर ली है।
- यह रिएक्टर 'इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र' (IGCAR) द्वारा विकसित और 'भाविनी' (BHAVINI - भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड) द्वारा निर्मित किया गया है।
भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम और भविष्य के लक्ष्य
- PFBR की सफलता भारत के महत्वाकांक्षी 'तीन-चरण वाले परमाणु कार्यक्रम' (Three-Stage Nuclear Programme) के दूसरे चरण की शुरुआत का प्रतीक है।
- यह रिएक्टर यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करता है और खपत से अधिक नए ईंधन का उत्पादन (Breding) करता है।
- यह उपलब्धि भारत को अपनी परमाणु रणनीति के तीसरे चरण में ले जाएगी, जहां भारत के विशाल थोरियम (Thorium) भंडार का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकेगा।
- भारत सरकार ने 2047 तक '100 गीगावाट' परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है।
लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और 'परमाणु मिशन'
| परियोजना / देश | वर्तमान स्थिति और विशेष जानकारी |
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| परमाणु मिशन (भारत) | इस नए मिशन के तहत ₹20,000 करोड़ के आवंटन के साथ, वर्ष 2033 तक 5 लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) स्थापित करने की योजना है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। |
| लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) | SMR कैप्टिव (स्वयं के उपयोग के लिए) बिजली उत्पादन, घनी आबादी वाले क्षेत्रों, ग्रिड कनेक्शन से वंचित दूर-दराज के क्षेत्रों और थर्मल संयंत्रों के पुन: उपयोग के लिए एक बेहतरीन विकल्प हैं। |
| रूस (Russia) | वर्तमान में विश्व का एकमात्र देश है जो व्यावसायिक आधार पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) संचालित कर रहा है। |
| अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान आदि | इन देशों ने ऐतिहासिक रूप से प्रायोगिक फास्ट रिएक्टर विकसित या संचालित किए थे, लेकिन इनमें से अधिकांश कार्यक्रम वर्तमान में बंद कर दिए गए हैं। |
DEOrbit परीक्षा नोट्स:
परमाणु विज्ञान में 'प्रथम क्रिटिकैलिटी' (First Criticality) का अर्थ वह अवस्था है जब एक परमाणु रिएक्टर में पहली बार एक नियंत्रित और आत्मनिर्भर (Self-sustaining) परमाणु विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया (Nuclear Fission Chain Reaction) शुरू होती है। इसके अलावा, 'फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (FBR) अपनी ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया के दौरान जितना विखंडनीय पदार्थ (ईंधन) खपत करते हैं, उससे कहीं अधिक मात्रा में नए विखंडनीय पदार्थ का निर्माण करते हैं, इसीलिए इन्हें 'ब्रीडर' कहा जाता है।
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